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HPS MATY OLYMPIAD OF TABLES

11/03/2017

आज स्थानीय एचपीएस सीनियर सैकण्डरी स्कूल में पहली व दूसरी कक्षा के पहाड़ों का ओलिम्पयाड करवाया गया। जिसमें कुल 76 विद्यार्थियों ने भाग लिया। 600 अंकों की इस प्रतियोगिता में लिखित व मौखिक रूप से पहाड़ों के कौशल को परखा गया जिसमें प्रथम कक्षा में अभिजोत सिंह ने 544 अंकों से प्रथम, तनिषका सिंगला ने 484 अंकों लेकर द्वितीय तथा परनीत कौर ने 444 तृतीय पुरस्कार हासिल किया। द्वितीय कक्षा में कुणाल ने 524 अंकों के साथ प्रथम, लक्ष्य ने 456 अंकों के साथ द्वितीय व रूपिन्द्र सिंह ने 452 अंकों के साथ तृतीय स्थान हासिल किया। 
    इस प्रतियोगिता का आयोजन विद्यालय के विद्यार्थियों की एचपीएस संसद के मुखिया रीया मोटन, रीतिका गर्ग, नम्रता व राहुल कम्बोज ने किया। इस अवसर पर विद्यालय निदेशक व प्रिंसीपल आचार्य रमेश सचदेवा ने कहा कि पहाड़े तो कितने ही बनाए जा सकते हैं और उन का नामकरण भी किया जा सकता है। लेकिन इस केलकुलेटर और कम्यूटर के जमाने में उन की उपयोगिता खत्म नहीं हुई है। जैसे भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के लिए शब्दों से मैत्री करनी पड़ती है, वैसे ही गणित की गहरी समझ हासिल करने के लिए अंकों से मैत्री करनी पड़ती है। मन ही मन गुणा-भाग करने की सामर्थ्य इसमें सहायक होता है। पहाडे कण्ठस्थ होने के कारण, भारतीय छात्र भी पी. एच. डी. की क्वालिफ़ाईंग में सशक्त स्पर्धा कर सकता है। 
    भारत में कम ही लोग जानते हैं, पर विदेशों में लोग मानने लगे हैं कि वैदिक विधि से गणित के हिसाब लगाने में न केवल मज़ा आता है, उससे आत्मविश्वास मिलता है और स्मरणशक्ति भी बढ़ती है.
    जर्मनी में सबसे कम समय का एक नियमित टेलीविज़न कार्यक्रम है विज़न फ़ोर अख्त. हिंदी में अर्थ हुआ कक्षा आठ के पहले ज्ञान की बातें देश के सबसे बड़े रेडियो और टेलीविज़न नेटवर्क एआरडी के इस कार्यक्रम में, हर शाम आठ बजे होने वाले मुख्य समाचारों से ठीक पहले, भारतीय मूल के विज्ञान पत्रकार रंगा योगेश्वर केवल दो मिनटों में ज्ञान-विज्ञान से संबंधित किसी दिलचस्प प्रश्न का सहज-सरल उत्तर देते हैं। कुछ दिन पहले रंगा योगेश्वर बता रहे थे कि भारत की क्या अपनी कोई अलग गणित है? वहां के लोग क्या किसी दूसरे ढंग से हिसाब लगाते हैं?
    भारत में भी कम ही लोग जानते हैं कि भारत की अपनी अलग अंकगणित है, वैदिक अंकगणित। भारत के स्कूलों में वह शायद ही पढ़ायी जाती है। भारत के शिक्षाशास्त्रियों का भी यही विश्वास है कि असली ज्ञान-विज्ञान वही है जो इंग्लैंड-अमेरिका से आता है। हम भारतीयों ने इस विषय को ट्यूश्न के द्वारा सफल होने का जरिया बना लिया है।
    अब भारत की वैदिक अंकगणित पर चकित हो रहे हैं और उसे सीख रहे हैं। बिना कागज़-पेंसिल या कैल्क्युलेटर के मन ही मन हिसाब लगाने का उससे सरल और तेज़ तरीका शायद ही कोई है।
    भारत का गणित-ज्ञान यूनान और मिस्र से भी पुराना बताया जाता है. शून्य और दशमलव तो भारत की देन हैं ही, कहते हैं कि यूनानी गणितज्ञ पिथागोरस का प्रमेय भी भारत में पहले से ज्ञात था।
    वैदिक विधि से बड़ी संख्याओं का जोड़-घटाना और गुणा-भाग ही नहीं, वर्ग और वर्गमूल, घन और घनमूल निकालना भी संभव है. इस बीच इंग्लैंड, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बच्चों को वैदिक गणित सिखाने वाले स्कूल भी खुल गये हैं। नासा की भी दिलचस्पी इसमें बढ़ गई है। ऑस्ट्रेलिया के कॉलिन निकोलस साद वैदिक गणित के रसिया हैं। 
    आप और हम अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा काम यही कर सकते हैं कि उन्हें वैदिक गणित सिखायें। इससे आत्मविश्वास, स्मरणशक्ति और कल्पनाशक्ति बढ़ती है। इस गणित के 16 मूल सूत्र जानने के बाद बच्चों के लिए हर ज्ञान की खिड़की खुल जाती है। यह प्रतियोगिता बाल संसद द्वारा पाक्षिक रूप से करवाने का निर्णय लिया गया।


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